Monday, September 13

अथक . . .




ये पत्थर अगर टूट सकें



तो फिर झरना फूट पड़ेगा



और बहने लगेगा जीवन



बस तब तक प्रयास की



और हिम्मत की है ज़रुरत,



बस थोड़ा मुश्किल है ये दौर



और कुछ कठिन हैं राहें



मगर ये कीमत कुछ ज्यादा नहीं



उसके लिए, जो पाना है,



माना कि पहरे पत्थरों के मज़बूत बहुत हैं



मगर इतनी हिफाजत तो होनी ही चाहिए

जीवन पीयूष के लिये ,



नहीं तो कैसे बच पायेगा ये उनके खातिर


जो इसकी क़द्र जानते हैं,



और फिर यकीन हैं जिन्हें



अपनी प्यास की सच्चाई पर



वो फिर पत्थरों के होने से



नहीं हैं निराश.


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2 comments:

Dimple Maheshwari said...

जय श्री कृष्ण...आपका लेखन वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं....नव वर्ष आपके व आपके परिवार जनों, शुभ चिंतकों तथा मित्रों के जीवन को प्रगति पथ पर सफलता का सौपान करायें .....मेरी कविताओ पर टिप्पणी के लिए आपका आभार ...आगे भी इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहिएगा ..!!

Dimple Maheshwari said...

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